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Saturday, September 11, 2010

एक शुरुआत थोड़ी फिल्मी सी.....

एक बंद संकरी गली और बत्ती गुल


बंद संकरी गली के भीतर जहां शाम के चार बजे एक खास किस्म का अंधेरा रैंग रहा था। पहुंचते ही कुछ पसीने से नहाई हुई शक्लें किसी चीज का इन्तजार करती दिखाई दी। मैं पहुचा और तय था कि इन्तजार किसी और चीज का था। यार पिछले दो घंटे से लाईट नहीं है। वहां पहुंचने तक तय हो चुका था कि वैन्यू अब चेंज करना होगा। बिना लाईट के स्क्रीनिंग सम्भव नही थी। सिनेमाथैक। इसी नाम से भरतनगर के सराय जुलैना के एक किराये के कमरे में आज कुछ फिल्में दिखाई जानी थी। सोच थी कि जामिया के एमसीआरसी के कुछ छात्रों की फिल्में स्क्रीन कर ली जायेंगी और इसी बहाने उसपे कुछ चर्चा भी हो जायेगी। पर लाईट। वाह लाईट आ गई। किसी ने कहा और सब ये देखकर खुश हो लिये कि सचमुच लाइट आ गई। उम्मीद नहीं थी कि उस छोटे से कमरे की चारपाई में पैर रखने की जगह नहीं रहेगी। आस पास की कुर्सियां धर ली जायेंगी लोग फर्श पर अपनी तशरीफें टिकाकर फिल्म देखेंगे और कुछ बदनसीब ऐसे भी बच जायेंगे जिन्हें दरवाजे से झांक झांककर फिल्में देखनी पड़ें़गी। पर ऐसा हुआ। दो फिल्में दिखाई गई और एक आडियोविजुअल और साथ में हर फिल्म के बाद हुई उसके अच्छे बुरे पहलुओं पर एक गर्मागर्म कही जा सकने वाली बहस। लगभग तीस लोगों के इन फिल्म प्रेमियों के समूह में कुछ थे जिनकी फिल्म दिखाई गई। जिन्हें कठघरे में खड़ा होना पड़ा। अपनी फिल्म पर हो रही क्रिटीसिजम और अच्छी बुरी बातों पर जवाबदेही तय करनी पड़ी। कुछ जो इन फिल्मों के कलाकार थे। कोई हीरो कोई हिरोईन कोई विलेन। जिन्हें शायद इस पूरी प्रक्रिया के दौरान स्टार वाली फीलिंग आती रही हो। पर अपनी कलाकार वाली प्रतिभा का भरपूर प्रयोग कर वो इसे न झलकाने में कामयाब होते दिखे। कुछ जो फिल्में बनाने सम्बन्धी पाठयक्रम के हिस्सेदार होने के नाते वहां आये और जमे रहे। कुछ जिन्होंने फिल्में तो देखी पर उनके तकनीकी पक्ष को लेकर उनका कोई खास विमर्श और इसकी जरुरत दोनों ही महसूस न होने के बावजूद उनके ज़ेहन में कई सवाल थे जो बाहर आये बिना नहीं रहे। लौंग शाट, क्लोजअप जैसी शब्दावलियों से खास सम्बंध न होने के बावजूद उनमें ये सब जानने की लालसा दिखी।

गुरुदत्त वाली प्यासा, फुल सर्कल और फिर चाहना

स्क्रीनिंग की शुरुआती फिल्म यानी गुरुदत्त वाली प्यासा। एक सीडी की दुकान, छोटा सा शहर और एक युवा प्रेमकहानी। रोहित वत्स, कदीर अहमद, हिना चुग और मेरी उर्फ उमेश पंत की इस फिल्म पर सबसे पहले चर्चा हुई। लोगों ने कहा फिल्म अच्छी है, और अच्छी हो सकती थी। फंलां सीक्वेन्स कमजोर दिखा और फलां सबसे बेहतर। ये शाट ऐसे क्यों लिया और इस शाट में कैमरा मूमेंट ऐसा क्यों रखा गया। फंलां कैरेक्टर थोड़ी और अच्छी एक्टिंग करता तो मजा आ जाता। इन सब बातों के बीच गुरुदत्त होते तो क्या इस बात से खुश नहीं होते कि कल के छोकरे उन्हें ट्रिब्यूट देते हुए फिल्म बना रहे हैं और नालायक देखो तो कैसे फिल्मों पर बड़ी बड़ी बातें कर रहे हैं। शायद उन्हें सीखने की इस प्रक्रिया से अपना नाम जुड़ना पसंद आता। प्यासा और कागज के फूल को इस फिल्म का हिस्सा बनते देखना अच्छा लगता। और शायद मैं छोटे मुंह कोई बड़ी सी बात अपने फिल्मी से जोश में आकर कह रहा हूं। शायद नहीं भी। उदयन की फुल सर्कल और दीक्षित दास, साहू की चाहना अगली दो फिल्में थी जो लगभग तीन घंटे की इस फिल्म देखने की प्रक्रिया का अंग बनी।

बिना बैग्राउन्ड का फिल्मकार

ये एक बहुट छोटा सा प्रयास था। लेकिन इसमें कई संकेत छिपे मालूम हुए। मसलन वहां एक फिल्मकार ऐसा भी मौजूद था जिसने पहले कभी फिल्म बनाने सम्बन्धी प्रशिक्षण तो नहीं लिया पर इतना हौसला दिखाया कि एक पीडी 170 उठाकर अपने ही दोस्तों से अभिनय कराकर एक दिखाने लायक फिल्म बनाने में कामयाब हो गया। माने ये कि फिल्म बनाना कोई विशेषज्ञता का काम नहीं रहा बस इतना जिगरा जरुर चाहिये कि एक इनीशियेटिव लिया जा सके। हम कुछ लोगों के बीच अब वो यानि उदयन बिस्वास एक डाईरेक्टर था जो केवल इसलिये भी तालियां बटोर ले गया कि उसने कोई बैग्राउन्ड न होने के बावजूद पहल की और एक फिल्म बनाई।

फिल्मी फलक के विस्तार की उम्मीद


सिनेमाथेक की शुरुआत करने वालों में से एक राजू कहते हैं कि वो चाहते हैं कि हर हफ्ते कोई न कोई फिल्म स्क्रीन की जाये जो हमी लोगों के बीच किसी ने बनाई हो। बनाने वाला वहां मौजूद हो ताकि कुछ उससे सीखा जा सके और कुछ उसे भी अपनी कमी और अच्छाईयां मालूम हो सकें। ज्यादातर स्डूडेन्ट फिल्म इसी विडम्बना के सांथ कहीं किसी बर्न सीडी की चकरी में दुबक के रह जाती हैं कि बनने के बाद उसे मुश्किल से कोई देखता या उसपे चर्चा करता है। और फिर दिल्ली के फिल्म स्कूलों में छात्रों की बनी फिल्में स्क्रीन होने और फिर उनपर चर्चा किये जाने की परंपरा ही शायद अब नहीं रही। एफटीआईआई या मुम्बई के फिल्म स्कूलों का आलम कुछ और हो सकता है पर एमसीआरसी के साथ इस मामले में कई दिक्कतें हैं। पहली ये कि वहां छात्र जैसे तैसे फिल्म बनाते तो हैं पर उसके लिये उन्हें उचित निर्देशन नहीं मिल पाता। फैकल्टी का मुम्बई के मेन स्ट्रीम सिनेमा से कोई सम्बंध नहीं होता। मुम्बई से कोई विजिटिंग फैकल्टी यहां आती नहीं या इतने प्रयास ही नही किये जाते कि कोई आना चाहे। ऐसे में छात्र वही बनाते हैं जो उन्हें समझ आता है। वो जैसा भी होता है उनके अपने प्रयासों का नतीजा होता है। और वो इतने भर से संतोष कर लेते हैं कि उन्हें कम से कम मंहंगी फिल्मी तकनीक की सामाग्री ही सही मुहैय्या हो पाई। वो एसआरथ्री से जूझे, बोलैक्स से खेले, नागरा में रिकौर्ड कर पाये और 16 एमएम की फिल्म को एक्सपोज करने का एडवेन्चर उन्हें नसीब हुआ। और कुछ अदद डाली या क्रेन शाट उनकी फिल्म के खाते में जुड़ पाये। बांकि कलाकार, शूटिंग, कास्टयूम, लोकेशन किसी चीज से फैकल्टी का कोई सम्बंध नहीं। आप जुटा पाये तो बेहतर। ना जुटा पाये तो फिर डुबाईये अपनी फिल्म की लुटिया। सीमित फुटेज, सीमित समय और एक बहुत सीमित अहाता जिसके भीतर आपको बीस से पच्चीस मिनट की अपनी फिल्म शूट करनी होगी। खैर ये तो हुआ बहाने से एक विषयान्तर । इस पर कभी और कहा ही जायेगा पूरे विस्तार से। वापस सिनेमाथैक पर लौटें तो सिनेमा पर और खासकर अपने बनाये हुए सिनेमा पर चर्चा करने की इस पहल से उम्मीदें नजर आती हैं। आगे योजना है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को इससे जोड़ा जाये। ऐसे लोग जो सिनेमा बनाते हों, समझते हों, समझना चाहते हों और इस पूरी प्रक्रिया से जुड़ना चाहते हों। उम्मीद यही है कि इसका फलक कमरे के अहाते से बाहर आयेगा। स्क्रीनिंग में इतने लोग जुटेंगे कि एक हाल भर में चर्चा हो पाये। स्क्रीनिंग के लिये हाल मुहैरूया कराने की पहल कहीं से होगी। और ये छोटा सा मंच धीरे धीरे एक बड़ा रुप लेगा। और परंपरा से अलग फिल्म कैसे बने और क्यों बने ये भी आपकी और हमारी शाम की चाय के दौरान चर्चा का विषय बनेगा।

आप भी आयें और फिल्में देखें, सुनें


आप भी अगर चाहें तो हमारे इस प्रयास से जुड़ सकते हैं। कुछ नहीं बस फिल्में देखते हुए साथ में थोड़ी बातें सातें हो जांयेंगी। बहाने से अपन जान लेंगे कि हम आप फिल्मों के बारे में आंखिर क्या सोचते हैं। कभी हो पायेगा तो एक आध फिल्म ही बना लेंगे साथ मिलकर।



स्क्रीनिंग पर इशिता तिवारी की रिपोर्ट पढ़ने के लिये यहां क्लिक करें
सिनेमाथेक के बारे में और जानने और हमसे जुड़ने के लिये माउस पे एक छोटी सी थपकी दें यहां

1 comments:

राजेश उत्‍साही said...

बधाई,इस प्रयास के लिए। सचमुच यह एक रचनात्‍मक पहल है। कुछ तो हो जिसके बहाने हम एक सार्थक बातचीत कर पाएं। अन्‍यथा बस बेवजह की नारेबाजी में समय गंवाते हैं। शुभकामनाएं। फिल्‍मों को विश्‍ले‍षित करके देखने का चस्‍का मुझे भी है। मैंने अपने ब्‍लाग गुल्‍लकhttp://utsahi.blogspot.com पर पिछले दिनों पीपली लाइव पर लिखा है। समय मिले तो देखें। कल ही वेल डन अब्‍बा देखी है। उसको लेकर भी कुछ दिमाग में कुलबुला रहा है। लिखूंगा।