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Thursday, September 30, 2010

मीडिया प्रशिक्षण का कौमनवेल्थ पाठयक्रम

 रोहित ने दो दिन पहले फोन करके बताया कि उनका एक लेख दैनिक भास्कर में छपा है। घर आकर उस लेख को पढ़ा और उस लेख में उसी पुराने रोहित की छवि नजर आ गई। स्कूल के दिनों में भी इसी तरह रोहित वहां की अनियमितताओं को मंच से बयान करते थे। और आज आईआईएमसी में रहते हुई उसकी अनियमितताओं का खुलकर विरोध कर रहे हैं। यहां उनका वो लेख पोस्ट कर रहा हूं इसी आशा के साथ कि उनकी यह बेबाक पत्रकारिता आगे भी जारी रहेगी।

रोहित जोशी
राष्ट मंडल खेलों के लिये पिछले दिनों मेन प्रेस सैंटर एमपीसी और ठन्टरनेष्नल ब्राडकास्टिंग सेटर आईबीसी का उदघाटन कर दिया गया। ये वे केन्द्र हैं जहां से देश विदेश के तमाम पत्रकार खेलों की रिपोर्टिंग कर अपने संस्थानों को भेजेंगे। खेलों के आयोजन के दौरान विदेशी मीडिया को खुश रखने की तैयारियां जहां जोरों पर हैं, वहीं इस खेल का मीडिया से जुड़ा ण्क ण्ेसा पहलू भी है जिसके बारे में कहीं कोई खबर नहीं है।
इतने बड़े आयोजन की सुचारु कवरेज के लिये अस्थाई तौर पर कुछ स्टाफ रखा गया है। पीआईबी और प्रसार भारती के लिये काम कर रहे इस स्टाफ को तीस हजार से एक लाख प्रति माह के बीच वेतन दिया जाना है। देश के प्रतियिठत पत्रकारिता संस्थान आईआईएमसी के छात्रों को भी इन दोनों संस्थानों ने बतौर प्रशिक्ष्ुा शामिल कर लिया है, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इनके पारश्रमिक के संबंध में कोई चर्चा अब तक नहीं हुई है। आईआईएमसी के छात्रों को यहां काम करते हुए एक महीना होने को है। ध्यान रहे कि महज नौ महीने के इस पाठयक्रम की शुरुआत में करीब 250 छात्रों को डेढ़ महीने के लिये प्रशिक्षण पर कौमनवेल्थ खेल स्थानों पर भेज दिया गया है।

 गजब तो यह है कि इस प्रशिक्षण में पत्रकारिता के छात्रों से जो काम करवाये जा रहे हैं, उनका पत्रकारिता से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं है। आगंतुक विदेशी पत्रकारों के लिये केटरिंग, बस कंडक्टर, गेटकीपर आदि का काम देश के सबसे बड़े पत्रकारिता प्रशिक्षण संस्थान के छात्रों को करना पड़ रहा है। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है िकइस काम को आईआईएमसी के पाठयक्रम का हिस्सा बताया गया है।

 आईआईएमसी प्रबंधन ने जिस अविवेकपूर्ण तरीके से भविष्य के पत्रकारों को राष्टमंडल खेलों में इन्टर्नशिप के लिये भेजा है, उससे लगता है कि प्रबंधन पर पीआईबी और प्रसार भारती को तकरीबन मुफत का स्टाफ उपलब्ध कराने का दबाव था। यू ंतो अन्तर्राष्टीय स्तर के इस आयोजन से जुड़ना मीडिया के छात्रों के लिये एक बड़े अवसर की तरह हो सकता था, लेकिन विडंबना और शर्म की बात यह है कि उन्हें पत्रकारिता से जुड़ा कोई भी काम यहां नहीं मिल पा रहा है। इससे ज्यादा खतरनाक एक अन्य पहलू है। पीआईबी और प्रसार भारती का काम देश विदेश के पत्रकारों को मैनेज करना है यानि राष्टमंडल खेलों के लिये खबरों का मैनेज करना। अपनी कक्षाओं में पत्रकारीय एथिक्स पर महीना भर पहले गर्मागर्म चर्चा करते छात्रों को अचानक अब मीडिया मैनेजमेंट के प्रशिक्षण में झोंक दिया गया है। सहज ही सोचा जा सकता है कि भविष्य के पत्रकारों का चरित्र कैसा होगा।

1 comments:

शैलेन्द्र नेगी said...

this is the part of there trainning. nothing new in this. they are just a student. they have to learn. rohit i would say har cheej ko ese pesh nahi karna chaahie ki ek hi paksh dikhe..