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Tuesday, December 14, 2010

मुम्बई के बीच से

इन दिनों मुम्बई में हूं। वहां वर्सोवा के समुद्री किनारे से मुम्बई पर कुछ लिखने का मन हुआ। गीली रेत पर अकेले कुछ घंटे चलते चलते बिताने के बीच से ये पंक्तियां आपके लिये


कैसी वर्सोवा वर्सोवा वाली चुप्पी सा शहर
कैसा जुहू चौपाटी सा ये शोर है
कैसी नरिमन नरिमन इसमें छाई है चकाचौंध
कैसी बांद्रा किनारे वाली भोर है

कैसे लहर लहर खुद तक खींच लेता है
कैसे बूंद बूंद खुद में समा लाता है
कैसे क्षितिज क्षितिज दिखलाता है सपने
कैसे सूरज सूरज कोई जगमगाता है
कब उगेगा कोई और जायेगा उभर
कैसी वर्सोवा वर्सोवा वाली चुप्पी सा शहर

केसे हवा हवा कोई बिखर जाता है यहां
कैसे रेत रेत कोई टूट जाता है
कैसी इमारतों से उंची रिश्तों की दूरियां
कैसे लिफ्ट लेकर उनतक पहुंचा जाता है
कैसे आसमान आसमान हसरतों के हैं पर
कैसी वर्सोवा वर्सोवा वाली चुप्पी सा शहर

ये शहर भरी भीड़ में वजूद ढूंढता
ये शहर जीत जाने का फितूर है
ये शहर धूल धूल से होता है शुरु
शिखर शिखर कहां इससे दूर है
सिमटा सिमटा फैला फैला भी मगर
कैसी वर्सोवा वर्सोवा वाली चुप्पी सा शहर

यहां परदा परदा लोग जाते हैं बदल
यहां फिल्म फिल्म लगती उतर जाती हैं
यहां चेहरा चेहरा बिकता है फिर बेचता है
यहां अदाएं बाजार हो जाती हैं
जो दिख रहा है बाहर वो है नहीं अन्दर
कैसी वर्सोवा वर्सोवा वाली चुप्पी सा शहर....

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