उन लोगों ने दिन रात मेहनत करके अपनी डिप्लोमा फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखी। उसे पिच गया। लेकिन जब फिल्म बनाने के दिन नजदीक आये तो उन्हें कहा गया कि उनकी अटेंडेंस सौर्ट है। इसलिये उन्हें ये फिल्म नहीं बनाने दी जायेगी। और न ही वो इस साल एक्जाम दे पायेंगे।
एमसीआरसी जामिया। एक निहायत ही जाना माना संस्थान जिसे फिल्म और जनसंचार की प-सजय़ाई के लिये आउटलुक का एक सर्वे तीसरे स्थान पर रखता है। अभी हाल ही में संस्थान के डाईरेक्टर बने ओबेद सिददीकी ने एक वैबसाईट में दिये अपने इन्टरव्यू में कहा कि मास कौम की 50 सीटों में से हर सीट के लिये कम से कम 35 परीक्षार्थियों के बीच प्रतिस्पर्धा होती है ऐसे में इसकी लोकप्रियता को अच्छी तरह सम-हजया जा सकता है। लेकिन मीडिया से जुड़े हर संस्थान की तरह मखमल के परदे से फैसिनेटिंग दिखने वाले एमआरसी के भीतर भी एक मरघट का संसार है। ज्यादा साहित्यिक ना होते हुए इस बात को कहा जाये तो पिछले कुछ सालों से एमसीआरसी के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। यहां प-सजय़ने से पहले छात्र तरह तरह के सपने लेकर इस संस्थान में दाखिल होते हैं और दाखिला मिल जाने पर खुद को बड़ा ही खुशकिस्मत सम-हजयते हैं। लेकिन दो साल तक जिन हालातों से वो रुबरु होते हैं वो इतने खुशनुमा कतई नहीं हैं। कम से कम बीते कुछ सालों के अनुभव देखकर ये बात नकारी नहीं जा सकती।
गौरतलब है कि एमसीआरसी में इस बीच एडमिनिस्टेªशन का रवैय्या वहां के स्टूडेटस के लिये परेशानी का सबब बनता रहा है। मौजूदा घटनाक्रम में एम ए मास कौम के 14 स्टूडेन्ट्स को ये कहकर उनके फाईनल प्रोजेक्ट बनाने और फाईनल एक्जाम देने से मना किया जा रहा है कि उनकी उपस्थिति इसके लिये पर्याप्त नहीं है। इनमें से ज्यातर स्टूडेन्ट्स ऐसे हैं जिनकी एटेंडेंस 70 प्रतिशत या उसके करीब है। लेकिन एमसीआरसी प्रशासन कहता है कि 75 प्रतिशत से कम उपस्थिति वाले छात्रों को न परीक्षा देने दी जायेगी न ही उनको उनके फाईनल प्रोजेक्ट बनाने दिये जाएंगे। अब ऐसे 14 छात्र छात्राओं का भविष्य खतरे में है जो केवल 5 से दस फीसदी दिन और क्लास नहीं आये या नहीं आ पाये। बावजूद इसके कि वो अपने अपने मेडिकल सर्टिफिकेट देने को तैयार हैं। लेकिन ये कहकर उन सर्टिफिकेटस को भी नकार दिया जा रहा है कि वो जाली हैं। एमसीआरसी के इस फैसले के विरोध में स्टूडेन्ट्स ने जन्तर मन्तर पर धरना दिया जिसकी खबर शायद कहीं नहीं छपी और उन्होंने कोर्ट में इस बाबत एक केस भी फाईल किया है जिसकी सुनवाई भी कोर्ट में हो चुकी है। लेकिन कोर्ट की ओर से ऐसा कोई फैसला अब तक नहीं आया है जिससे छात्रों को कोई राहत मिल सके। इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट में दो बार सुनवाई हुई जिसमें कहा गया कि यदि जामिया के वीसी चाहें तो एमसीआरसी के इस फैसले पर विचार किया जा सकता है लकिन अब वीसी भी ये कह चुके हैं कि ये स्टूडेन्टस परीक्षा नहीं दे सकते। कुल मिलाकर देखें तो ये एक प्रंसीडेन्ट सेट करने की कोशिश है ताकि स्टूडेन्टस अगली बार से 75 प्रतिशत के इस जादुई आंकड़े की अवहेलना करने का साहस ना कर सकें। एमसीआरसी के इस क्रूर और अनैतिक फैसले के बाद सारे छात्र सकते में हैं। और अब उन्होंने इस फैसले का पुरजोर मन बना लिया है। कल से वो इस फैसले के खिलाफ आमरण अनसन करने जा रहे हैं। इस बाबत एक प्रेस रिलीज भी जारी की गई है। जिसे आप सभी साथियों को भेजा जा रहा है।
एमसीआरसी छात्रों की जिस अटेंडेंस को सौर्ट बता रहा है दरअसर उस अटेंडैंस का आधार ही मौखिक है। फिल्मों को लेकर जो भी अभ्यास सत्र होते हैं उनमें अटेंडेंस किसी रोल कौल के आधार पर नहीं ली जाती बल्कि फैकल्टी में से कोई एक टीचर आकर छात्रों के चेहरे देखकर अटेंडेंस ले जाता है। अब एक संस्थान जो अपने छात्रों के लिये अंश मात्र भी सरोकार नहीं रखता उससे कैसे उम्मीद की जा सकती है कि इस मौखिक अटेंडेंस में धंाधली या लापरवाही नहीं हुई होगी। दूसरा सवाल ये कि एमसीआरसी के ज्यादातर टीचर्स अपने अपने कारणों से छुटटी पर हैं, अब वहां प-सजय़ाने के लिये वैसे ही बहुत कम अनुभवी टीचर्स बचे हैं जिनमें से भी ज्यादातर खुद क्लास लेना पसंद नहीं करते। ऐसे में छात्र क्या प-सजय़ने के लिये रोज रोज संस्थान जांयें उन्हें ये बात सम-हजय नहीं आती। टीचर्स से पूछा जाना चाहिये क्या उनकी खुद की क्वालीफिकेशन इतनी है कि वो एक सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी में प-सजय़ा सकें। गौरतलब है कि एमसीआरसी के ज्यादातर टीचर्स की क्वालिफिकेशन को लेकर सवालिया निशान हैं। किसी तरह वो यहां टिके हुए हैं। इस बाबत भी कोर्ट में एक मामला चल रहा है। और कुछ टीचर्स कोर्ट से स्टे आर्ड लेकर अपने पदों पर बने हुए। ये भी सवाल उठाया जाना चाहिये कि एमसीआरसी में फिल्म प-सजय़ रहे छात्रों की वर्कशौप्स के लिए कितना पैसा आता है और वो जाता कहां है। और क्या जितनी वर्कशौप होती हैं वो पर्याप्त हैं। इन सारे सवालों के बाबत वहां के छात्रों ने आरटीआई भी फाईल की है जिसका जवाब आना अभी बाकी है।
एक क्रियेटिविटी से जुड़े संस्थान में नियम और कानूनों की ऐसी खोखली शर्तें कितनी जायज हैं ये एक बहुत बड़ा सवाल है जो एमसीआरसी के छात्र हमेशा से पूछते आये हैं। पर उनकी ये आवाज कभी उस संस्थान की चाहरदीवारी से बाहर नहीं गई।
एमसीआरसी जब ये दावा करता है कि वो केवल बेहतरीन छात्रों को अपनी कड़ी परीक्षा के बाद संस्थान में प्रवेश देता है तो फिर ऐसी क्या वजह है कि उनपर संस्थान को इतना भरोसा नहीं है कि उनके मेडिकल सर्टिफिकेट फर्जी कहे जा रहे हैं। कि उनकी फिल्मों के कन्सेप्ट बिना फैकल्टी द्वारा बताये गये बदलावों के स्वीकार नहीं किये जाते।
ये बातें पहली बार देखने पर किसी संस्थान की अंदरुनी बातें लग सकती हैं लेकिन अव्वल तो ये कि एमसीआरसी कोई निजी संस्थान नहीं है जिसपर वहां के एडमिनिस्ट्रेशन की मोनोपौली चले और दूसरा ये कि ये संस्थान शिक्षा पर खर्च होने वाले बजट का एक बड़ा हिस्सा अपनी -हजयोली में डालता है इसलिये इस बात पर सार्वजनिक रुप में चर्चा होनी ही चाहिये कि वहां भीतरखाने आंखिर चल क्या रहा है।
एक नामी संस्थान के लिये इससे खराब बात और कोई नहीं हो सकती कि वहां छात्रों पर नियम और कानूनों के खोखले और बेवजा बो-हजय को डालकर उनसे ये उम्मीद की जा रही है कि वो आपको कुछ अच्छी फिल्में बनाकर देंगे। क्रियेटिव मीडियम में काम करने वाले ये अच्छी तरह जानते होंगे कि मानसिक दबाव से बड़ी दासता उनके लिये कुछ और नहीं हो सकती। पर एमसीआरसी की फैकल्टी को ये बात न जाने कब सम-हजय आयेगी।
सवाल ये है कि संस्थान में प-सजय़ाने वाले टीचर्स का विजन इस कोर्स को लेकर क्या है। क्या वो एक निश्चित समयावधि में छात्रों से निर्धारित प्रोजैक्ट बनवाकर कोर्स पूरा कर लेने को लेकर ज्यादा चिन्तित हैं या फिर वो उनमें सिनेमा जैसे आर्टफौर्म की सम-हजय विकसित करने की मंशा रखते हैं। ताकि वो अपने भीतर मौजूद क्रियेटिव आईडियाज को अपनी मर्जी से पर्दे पर उकेरना सीख सकंे। मौजूदा हालात देखते हुए तो पहली बात ही सही लगती है जो कि सचमुच बड़ी चिन्ताजनक है। अनवर जमाल किदवई ने जिस विजन को लेकर एमसीआरसी को शुरु किया था वो विजन अब एमसीआरसी के मौजूदा पाठयक्रम में कहीं दिखाई नहीं देता।
टीचर्स और स्टूडेन्टस के बीच के रिश्ते को इसी बात से सम-हजया जा सकता है कि फाईनल इयर की परीक्षाएं देने के बाद जब एक प्रोडक्शन हाउस प्लेसमेंट के लिये आता है तो संस्थान छात्रों को इन्टरव्यू के लिए एक कमरा देने से मना कर देता है। इससे पता चलता है कि फैकल्टी के स्टूटेंटस के साथ किस तरह के कन्सर्न हैं। एमसीआरसी एक ओर अपने कोर्स को बड़ा ही प्रतिष्ठाजनक कहता है और दूसरी ओर वहां प्लेसमेंट की कोई भी व्यवस्था छात्रों को मयस्सर नहीं है। यहां तक कि जो प्रोडक्शन हाउस या न्यूज चैनल प्लेसमेंट के लिये आना भी चाहते हैं उन्हें संस्थान बिना छात्रों से पूछे ये कह देता है कि उनके पास समय नहीं है। ऐसे में कोर्स खत्म हो जाने के बाद मुश्किल से कुछ छात्रों को जौब मिल पाती है और बाकि छात्रों को अपने बूते ही इन्डस्टी में जूते घिसने पड़ते हैं।
जमिया में छात्रसंघ जैसी कोई संस्था भी नहीं है जो छात्रों के हित की बात प्रभावशाली तरीके से कर सके। ऐसे में वहां का एडमिनिस्टेशन छात्रों पर जबरन अपने फैसले बड़ी आसानी और क्रूरता से थोप देता है। एमसीआरसी का ये मौजूदा घटनाक्रम इसकी एक बानगी भर है।
मौजूदा घटनाक्रम में इन छात्रों को कोर्ट कचहरी के चक्कर में अपनी जेब से पैसा खर्च करना पड़ रहा है। हमारी महंगी न्याय प्रणाली में न्याय मिलते मिलते कितना समय और पैसा खर्च होता है ये किसी से छुपा नहीं है। इन छात्रों में से हर कोई आर्थिक रुप से इतना सशक्त नहीं है कि वो इस खर्च को अफोर्ड कर सके और आत्मनिर्भर तो छात्र को होने के नाते कोई नहीं है। ऐसे में न्याय की इस लम्बी लड़ाई का कमजोर पड़ जाना भी सम्भव है। अगर ये छात्र अगले साल फिर परीक्षा देने का इन्तजार करें तो उनका एक साल तो बरबाद होगा ही साथ ही हजारों रुपये की मोटी फीस जो एमसीआरसी छात्रों से उगाहता है उसका इन्तजाम भी इन्हें करना होगा। ऐसे में सम्भव है कि कुछ छात्रों को अगले साल योग्यता हाने के बावजूद कोर्स छोड़ ही देना पड़े।
इन सारी अनियमितताओं का उजागर होना एमसीआरसी के गिरते हुए स्तर को वापस लाने के लिये बहुत जरुरी है। अब जब छात्र इन बातों को लेकर लामबंद हो रहे हैं तो उन्हें आप सब के सहयोग की जरुरत है। आपसे यही अपील है कि कल के आमरण अनशन में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें और उन छात्रों को अपना सहयोग दें।






















0 comments:
Post a Comment