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Tuesday, May 10, 2011

अभी वीसी ने मिलने बुलाया है....देखें साहब क्या कहते हैं


एमसीआरसी की छात्रा सबा रहमान की टिप्पणी



कल एमसीआरसी के छात्रों के विरोध प्रदर्शन का तीसरा दिन था। बिना खाये पिये वो अपनी मांगों को लेकर डटे हुए हैं। फाईनल इयर की सानिया अहमद और फहद की हालत आज बिगड़ गई। उन्हें होली फैमिली हौस्पिटल में भर्ती कराना पड़ा। कल की हिंसक कार्रवाई के बाद आज इन छात्रों के समर्थन में कुछ ज्यादा लोग जुटे। लेकिन जामिया के वीसी और एमसीआरसी के डाईरेक्टर दोनों के कान में अब तक जूं नहीं रेंगी है। पत्रकारों ने उनसे सम्पर्क करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने फोन उठाना भी गवारा न समझा। अब इसे किसी तरह हठ कहा जाये या फिर भागने की कोशिश लेकिन जो भी हो इससे मामले का कोई हल नहीं निकलेगा। एमसीआरसी की फैकल्टी की ओर से जीआर सैययद अपनी पत्नी के साथ धरने पर छात्रों का हाल जानने पहुंचे। एफ बी खान भी कुछ देर के लिये आये और छात्रों से बात की। लेकिन किसी भी समाधान के लिये वीसी या डाईरेक्टर साहब का इस मामले पर कुछ कहना जरुरी है। जो कि अब तक नहीं हुआ है। इस बीच छात्रों को प्रिटं मीडिया का पूरा सपोर्ट मिला। आज लगभग हर समाचार पत्र में जामिया का तानाशाही रवैयया खबर बना लेकिन इलैक्टोनिक मीडिया को इस खबर में कोई ग्लैमर नहीं दिखा। 

इस बीच जामिया के पूर्व छात्रों की ओर से प्रतिक्रिया का दौर जारी है। मुम्बई में काम कर रहे ओसामा शाब इस मामले को लेकर कहते हैं
 कि शान्तिपूर्ण विरोध लोकतंत्र का मूलभूत तत्व है। ये एक अकेला तरीका है जिससे कि हम कह सकते हैं कि कुछ गलत हो रहा है। मुझे हमेशा से मालूम था कि हमारे देश का इतना लोकतांत्रिक हो पाना एक दूर की बात है। लेकिन सड़कों पर शान्तिपूर्ण तरीके से अपने अधिकार को मांगने के लिए बैठे हुए जामिया के छात्रों को पिटवाया और गिरफतार करवाया जाना एक बहुत ही निन्दनीय घटना है। उम्मीद यही है कि इस घृणित काम की खबर ज्यादा से ज्यादा लोगों को हो ताकि इसके खिलाफ एक माहौल बनाया जा सके।

अभी तक जामिया की फैकल्टी से जुड़े रहे लोगों  ने इस मामले पर चुप रहना ही बेहतर समझा था। लेकिन कल हुई हिंसक घटना के बाद उन्हें भी महसूस हुआ कि अब ज्यादा हो गया है। आज उनकी चुप्पी भी टूटी । जामिया की पूर्व फैकल्टी मेम्बर स्रुति नागपाल ने कहा हिंसा और ताकत जीतती हुई नजर तो आती है पर ऐसी जीत बहुत अल्पजीवी होती है। मैं कैम्पस में छात्रों के विरुद्ध हो रही किसी भी हिंसा के खिलाफ आवाज उठाने के अधिकार का सम्मान करती हूं। 

अनशन स्थल पर मौजूद कन्वर्जेन्ट जर्नलिजम की छात्रा आकांक्षा सक्सेना ने बताया कि कल की घटना के बाद आज कैम्पस के चारों ओर मौजूद भारी पुलिस दल ने सब कुछ अपने आप कह दिया। वहां हो क्या रहा है ये जानने के लिये उत्सुक राह चलते लोग कुछ देर वहां रुके तो उन्हें जानकारी हुई कि ये छात्र अपने अधिकार के लिये लड़ रहे हैं। आज जामिया की फैकल्टी से कुछ लोग यहां आये और उन्होंने छात्रों की कहानी सुनी। उम्मीद है कि अब कुछ हल निकलेगा। समय आ गया है कि हम एक होकर न्याय की गुहार लगायें। अगर हम अलग हुए तो टूट जायेंगे। हमने इस बीच कैम्पस प्लेसमेंट से लेकर छात्रों के अधिकारों तक हर चीज में एमसीआरसी के स्तर में भारी गिरावट देखी है। एमसीआरसी स्वार्थी और भ्रष्ट लोगों की मंडली में तब्दील होता जा रहा है। हमें एमसीआरसी को डिक्टेरशिप से बचाने का प्रयास करना चाहिये।

इस पूरे मामले को लेकर जामिया विश्वविद्यालय ने एक वैबसाईट को दी गई अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि ये बड़ी निराशा की बात है कि कुछ असामाजिक तत्व एजेकेएमसीआरसी के छात्रों द्वारा किये जा रहे धरने को पूरे एरिया की शान्ति भंग करने के उददेश्य से हाईजैक करने की कोशिश कर रहे हैं। जामिया की ओर से आयी ये प्रतिक्रिया छात्रों के विरोध प्रदर्शन के बारे में लोगों को दिग्भ्रमित करने की कोशिश से ज्यादा और कुछ नहीं लगती। 

अभी कुछ ही देर में जामिया के वीसी और छात्रों की मुलाकात तय की गई है। साथ ही एचआरडी मिनिस्टी में भी छात्रों को आज अपनी बात रखने के लिये बुलाया गया है। देखना है कि उस मुलाकात का क्या नतीजा निकलता है। फिलवक्त उम्मीद की जानी चाहिये कि छात्रों के हित को गलती से ही सही ध्यान में रखकर संस्थान आगे कोई कार्यवाई करेगा।

Sunday, May 8, 2011

पढ़ाई की जगह पिटाई, क्या यही है एमसीआरसी का असली चेहरा

जामिया के एमसीआरसी के छात्रों की भूख हड़ताल का आज दूसरा ही दिन था और प्रशासन को ये गवारा न हुआ कि उन्हें अपनी बात शान्तिपूर्ण तरीके से रखने दी जाये। उन्होंने छात्रों के शान्तिपूर्ण विरोध का दमन करने के लिये जो तरीका अपनाया आप इस वीडियो में देख सकते हैं। पुलिस ने स्थानीय एसएचओ सतबीर सिंह डागर के नेतृत्व में इन छात्रों पर लाठीचार्ज किया। आज जामिया के छात्रों के साथ दिल्ली विश्वविद्यालय और जेएनयू के छात्र भी भूख हड़ताल में शामिल थे।  पुलिस के लाठीचार्ज के दौरान  जामिया के छात्र अरहान को काफी चोटें आई और ब्लीडिंग भी हुई। अरहान की मां भी वहां मौजूद थी जिन्होंने इस घटना का विरोध किया तो पुलिस ने उन्हें भी पीटने की धमकी दी। पुलिस ने प्रदर्शनकारी छात्रों के बैनर] पर्चे और बिस्तर भी जब्त कर लिये और इनमें से कुछ छात्रों को अपने साथ ले गई और कुछ देर हिरासत में रखा। होना तो ये चाहिये था कि एमसीआरसी के डाईरेक्टर छात्रों के साथ मिलकर कोई समाधान निकालते। लेकिन उन्हें कानून और पुलिस के डंडे की भाषा के सिवाय कोई और भाषा आती ही कहां है। 


इससे पहले भी डाईरेक्टर साहब छात्रों से हमेशा नोटिस और धमकी की जबान में ही बात करते रहे हैं। ये वीडियो अपने ही संस्थान के छात्रों के प्रति उनके रवैय्ये का एक छोटा सा नमूना है। कुछ इसी तरह का रवैय्या छात्रों के लिये जामिया के निवर्तमान वाईस चांसलर का भी है। इस मसले पर सुनवाई के बाद जब  न्यायालय ने कहा था कि जामिया के वीसी  इस मामले पर कोई फैसला ले सकते हैं तो छात्र उनके पास गये कि वो इस मसले का कोई समाधान निकालें। लेकिन वो तो पहले से ही जंग के मूड में थे। उन्होंने ये कहते हुए छात्रों को लताड़ लगा दी कि अगर आपके पास पैसे नहीं हैं या फिर आपको कोई बड़ी बीमारी है तो जामिया में पढ़ने के लिए मत आएं। मैं जामिया को बहुत ही सख्ती से रुल करने वाला हूं। डाईरेक्टर साहब छात्रों की इस मांग को नाजायज बताकर अपनी फैकल्टी की लापरवाहियो को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं। और इस मामले में जामिया के वीसी उनकी पूरी तरह से मदद कर रहे हैं। कहां तो ये स्टूडेन्टस इस समय अपनी फिल्मों की पटकथा को फिल्माने के लिये दिमागी मशक्कत कर रहे होते और कहां एमसीआरसी उन्हें लाठियों से पिटवा रहा है। ये हैरानी की बात है कि एक फिल्म स्कूल जिसका काम छात्रों को फिल्मकार बनाने का है वो छात्रों को आन्दोलनकारी बनने पर मजबूर कर चुका है। अब आगे देखना है कि ये मामला क्या मोड़ लेता है। लेकिन फिलहाल जामिया] दिल्ली विश्वविद्यालय और जेएनयू के छात्रों ने इस मुददे पर एक होकर लामबंद होने का फैसला कर लिया है। कल इस मामले को लेकर एक शान्ति मार्च निकाले जाने की भी योजना है।  

Friday, May 6, 2011

आप सभी से एक अपील





उन लोगों ने दिन रात मेहनत करके अपनी डिप्लोमा फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखी। उसे पिच गया। लेकिन जब फिल्म बनाने के दिन नजदीक आये तो उन्हें कहा गया कि उनकी अटेंडेंस सौर्ट है। इसलिये उन्हें ये फिल्म नहीं बनाने दी जायेगी। और न ही वो इस साल एक्जाम दे पायेंगे।

एमसीआरसी जामिया। एक निहायत ही जाना माना संस्थान जिसे फिल्म और जनसंचार की प-सजय़ाई के लिये आउटलुक का एक सर्वे तीसरे स्थान पर रखता है। अभी हाल ही में संस्थान के डाईरेक्टर बने ओबेद सिददीकी ने एक वैबसाईट में दिये अपने इन्टरव्यू में कहा कि मास कौम की 50 सीटों में से हर सीट के लिये कम से कम 35 परीक्षार्थियों के बीच प्रतिस्पर्धा होती है ऐसे में इसकी लोकप्रियता को अच्छी तरह सम-हजया जा सकता है। लेकिन मीडिया से जुड़े हर संस्थान की तरह मखमल के परदे से फैसिनेटिंग दिखने वाले एमआरसी के भीतर भी एक मरघट का संसार है। ज्यादा साहित्यिक ना होते हुए इस बात को कहा जाये तो पिछले कुछ सालों से एमसीआरसी के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। यहां प-सजय़ने से पहले छात्र तरह तरह के सपने लेकर इस संस्थान में दाखिल होते हैं और दाखिला मिल जाने पर खुद को बड़ा ही खुशकिस्मत सम-हजयते हैं। लेकिन दो साल तक जिन हालातों से वो रुबरु होते हैं वो इतने खुशनुमा कतई नहीं हैं। कम से कम बीते कुछ सालों के अनुभव देखकर ये बात नकारी नहीं जा सकती।

गौरतलब है कि एमसीआरसी में इस बीच एडमिनिस्टेªशन का रवैय्या वहां के स्टूडेटस के लिये परेशानी का सबब बनता रहा है। मौजूदा घटनाक्रम में एम ए मास कौम के 14 स्टूडेन्ट्स को ये कहकर उनके फाईनल प्रोजेक्ट बनाने और फाईनल एक्जाम देने से मना किया जा रहा है कि उनकी उपस्थिति इसके लिये पर्याप्त नहीं है। इनमें से ज्यातर स्टूडेन्ट्स ऐसे हैं जिनकी एटेंडेंस 70 प्रतिशत या उसके करीब है। लेकिन एमसीआरसी प्रशासन कहता है कि 75 प्रतिशत से कम उपस्थिति वाले छात्रों को न परीक्षा देने दी जायेगी न ही उनको उनके फाईनल प्रोजेक्ट बनाने दिये जाएंगे। अब ऐसे 14 छात्र छात्राओं का भविष्य खतरे में है जो केवल 5 से दस फीसदी दिन और क्लास नहीं आये या नहीं आ पाये। बावजूद इसके कि वो अपने अपने मेडिकल सर्टिफिकेट देने को तैयार हैं। लेकिन ये कहकर उन सर्टिफिकेटस को भी नकार दिया जा रहा है कि वो जाली हैं। एमसीआरसी के इस फैसले के विरोध में स्टूडेन्ट्स ने जन्तर मन्तर पर धरना दिया जिसकी खबर शायद कहीं नहीं छपी और उन्होंने कोर्ट में इस बाबत एक केस भी फाईल किया है जिसकी सुनवाई भी कोर्ट में हो चुकी है। लेकिन कोर्ट की ओर से ऐसा कोई फैसला अब तक नहीं आया है जिससे छात्रों को कोई राहत मिल सके। इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट में दो बार सुनवाई हुई जिसमें कहा गया कि यदि जामिया के वीसी चाहें तो एमसीआरसी के इस फैसले पर विचार किया जा सकता है लकिन अब वीसी भी ये कह चुके हैं कि ये स्टूडेन्टस परीक्षा नहीं दे सकते। कुल मिलाकर देखें तो ये एक प्रंसीडेन्ट सेट करने की कोशिश है ताकि स्टूडेन्टस अगली बार से 75 प्रतिशत के इस जादुई आंकड़े की अवहेलना करने का साहस ना कर सकें। एमसीआरसी के इस क्रूर और अनैतिक फैसले के बाद सारे छात्र सकते में हैं। और अब उन्होंने इस फैसले का पुरजोर मन बना लिया है। कल से वो इस फैसले के खिलाफ आमरण अनसन करने जा रहे हैं। इस बाबत एक प्रेस रिलीज भी जारी की गई है। जिसे आप सभी साथियों को भेजा जा रहा है।

एमसीआरसी छात्रों की जिस अटेंडेंस को सौर्ट बता रहा है दरअसर उस अटेंडैंस का आधार ही मौखिक है। फिल्मों को लेकर जो भी अभ्यास सत्र होते हैं  उनमें अटेंडेंस किसी रोल कौल के आधार पर नहीं ली जाती बल्कि फैकल्टी में से कोई एक टीचर आकर छात्रों के चेहरे देखकर अटेंडेंस ले जाता है। अब एक संस्थान जो अपने छात्रों के लिये अंश मात्र भी सरोकार नहीं रखता उससे कैसे उम्मीद की जा सकती है कि इस मौखिक अटेंडेंस में धंाधली या लापरवाही नहीं हुई होगी। दूसरा सवाल ये कि एमसीआरसी के ज्यादातर टीचर्स अपने अपने कारणों से छुटटी पर हैं, अब वहां प-सजय़ाने के लिये वैसे ही बहुत कम अनुभवी टीचर्स बचे हैं जिनमें से भी ज्यादातर खुद क्लास लेना पसंद नहीं करते। ऐसे में छात्र क्या प-सजय़ने के लिये रोज रोज संस्थान जांयें उन्हें ये बात सम-हजय नहीं आती। टीचर्स से पूछा जाना चाहिये क्या उनकी खुद की क्वालीफिकेशन इतनी है कि वो एक सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी में प-सजय़ा सकें। गौरतलब है कि एमसीआरसी के ज्यादातर टीचर्स की क्वालिफिकेशन को लेकर सवालिया निशान हैं। किसी तरह वो यहां टिके हुए हैं। इस बाबत भी कोर्ट में एक मामला चल रहा है। और कुछ टीचर्स कोर्ट से स्टे आर्ड लेकर अपने पदों पर बने हुए। ये भी सवाल उठाया जाना चाहिये कि एमसीआरसी में फिल्म प-सजय़ रहे छात्रों की वर्कशौप्स के लिए कितना पैसा आता है और वो जाता कहां है। और क्या जितनी वर्कशौप होती हैं वो पर्याप्त हैं। इन सारे सवालों के बाबत वहां के छात्रों ने आरटीआई भी फाईल की है जिसका जवाब आना अभी बाकी है। 
एक क्रियेटिविटी से जुड़े संस्थान में नियम और कानूनों की ऐसी खोखली शर्तें कितनी जायज हैं ये एक बहुत बड़ा सवाल है जो एमसीआरसी के छात्र हमेशा से पूछते आये हैं। पर उनकी ये आवाज कभी उस संस्थान की चाहरदीवारी से बाहर नहीं गई।

एमसीआरसी जब ये दावा करता है कि वो केवल बेहतरीन छात्रों को अपनी कड़ी परीक्षा के बाद संस्थान में प्रवेश देता है तो फिर ऐसी क्या वजह है कि उनपर संस्थान को इतना भरोसा नहीं है कि उनके मेडिकल सर्टिफिकेट फर्जी कहे जा रहे हैं। कि उनकी फिल्मों के कन्सेप्ट बिना फैकल्टी द्वारा बताये गये बदलावों के स्वीकार नहीं किये जाते।
ये बातें पहली बार देखने पर किसी संस्थान की अंदरुनी बातें लग सकती हैं लेकिन अव्वल तो ये कि एमसीआरसी कोई निजी संस्थान नहीं है जिसपर वहां के एडमिनिस्ट्रेशन की मोनोपौली चले और दूसरा ये कि ये संस्थान शिक्षा पर खर्च होने वाले बजट का एक बड़ा हिस्सा अपनी -हजयोली में डालता है इसलिये इस बात पर सार्वजनिक रुप में चर्चा होनी ही चाहिये कि वहां भीतरखाने आंखिर चल क्या रहा है।

एक नामी संस्थान के लिये इससे खराब बात और कोई नहीं हो सकती कि वहां छात्रों पर नियम और कानूनों के खोखले और बेवजा बो-हजय को डालकर उनसे ये उम्मीद की जा रही है कि वो आपको कुछ अच्छी फिल्में बनाकर देंगे। क्रियेटिव मीडियम में काम करने वाले ये अच्छी तरह जानते होंगे कि मानसिक दबाव से बड़ी दासता उनके लिये कुछ और नहीं हो सकती। पर एमसीआरसी की फैकल्टी को ये बात न जाने कब सम-हजय आयेगी।

सवाल ये है कि संस्थान में प-सजय़ाने वाले टीचर्स का विजन इस कोर्स को लेकर क्या है। क्या वो एक निश्चित समयावधि में छात्रों से निर्धारित प्रोजैक्ट बनवाकर कोर्स पूरा कर लेने को लेकर ज्यादा चिन्तित हैं या फिर वो उनमें सिनेमा जैसे आर्टफौर्म की सम-हजय विकसित करने की मंशा रखते हैं। ताकि वो अपने भीतर मौजूद क्रियेटिव आईडियाज को अपनी मर्जी से पर्दे पर उकेरना सीख सकंे। मौजूदा हालात देखते हुए तो पहली बात ही सही लगती है जो कि सचमुच बड़ी चिन्ताजनक है। अनवर जमाल किदवई ने जिस विजन को लेकर एमसीआरसी को शुरु किया था वो विजन अब एमसीआरसी के मौजूदा पाठयक्रम में कहीं दिखाई नहीं देता।

टीचर्स और स्टूडेन्टस के बीच के रिश्ते को इसी बात से सम-हजया जा सकता है कि फाईनल इयर की परीक्षाएं देने के बाद जब एक प्रोडक्शन हाउस प्लेसमेंट के लिये आता है तो संस्थान छात्रों को इन्टरव्यू के लिए एक कमरा देने से मना कर देता है। इससे पता चलता है कि फैकल्टी के स्टूटेंटस के साथ किस तरह के कन्सर्न हैं। एमसीआरसी एक ओर अपने कोर्स को बड़ा ही प्रतिष्ठाजनक कहता है और दूसरी ओर वहां प्लेसमेंट की कोई भी व्यवस्था छात्रों को मयस्सर नहीं है। यहां तक कि जो प्रोडक्शन हाउस या न्यूज चैनल प्लेसमेंट के लिये आना भी चाहते हैं उन्हें संस्थान बिना छात्रों से पूछे ये कह देता है कि उनके पास समय नहीं है। ऐसे में कोर्स खत्म हो जाने के बाद मुश्किल से कुछ छात्रों को जौब मिल पाती है और बाकि छात्रों को अपने बूते ही इन्डस्टी में जूते घिसने पड़ते हैं।

जमिया में छात्रसंघ जैसी कोई संस्था भी नहीं है जो छात्रों के हित की बात प्रभावशाली तरीके से कर सके। ऐसे में वहां का एडमिनिस्टेशन छात्रों पर जबरन अपने फैसले बड़ी आसानी और क्रूरता से थोप देता है। एमसीआरसी का ये मौजूदा घटनाक्रम इसकी एक बानगी भर है।

मौजूदा घटनाक्रम में इन छात्रों को कोर्ट कचहरी के चक्कर में अपनी जेब से पैसा खर्च करना पड़ रहा है। हमारी महंगी न्याय प्रणाली में न्याय मिलते मिलते कितना समय और पैसा खर्च होता है ये किसी से छुपा नहीं है। इन छात्रों में से हर कोई आर्थिक रुप से इतना सशक्त नहीं है कि वो इस खर्च को अफोर्ड कर सके और आत्मनिर्भर तो छात्र को होने के नाते कोई नहीं है। ऐसे में न्याय की इस लम्बी लड़ाई का कमजोर पड़ जाना भी सम्भव है। अगर ये छात्र अगले साल फिर परीक्षा देने का इन्तजार करें तो उनका एक साल तो बरबाद होगा ही साथ ही हजारों रुपये की मोटी फीस जो एमसीआरसी  छात्रों से उगाहता है उसका इन्तजाम भी इन्हें करना होगा। ऐसे में सम्भव है कि कुछ छात्रों को अगले साल योग्यता हाने के बावजूद कोर्स छोड़ ही देना पड़े।


इन सारी अनियमितताओं का उजागर होना एमसीआरसी के गिरते हुए स्तर को वापस लाने के लिये बहुत जरुरी है। अब जब छात्र इन बातों को लेकर लामबंद हो रहे हैं तो उन्हें आप सब के सहयोग की जरुरत है। आपसे यही अपील है कि कल के आमरण अनशन में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें और उन छात्रों को अपना सहयोग दें।

Wednesday, April 6, 2011

किसके लिए लड़ रहे हैं अन्ना हजारे....


जन लोकपाल विधेयक पर अंग्रेजी में बहुत सी पाठ्यसामागी इन्टरनेट पर मौजूद है। हिन्दी में ना के बराबर जानकारी है। इसलिये ये लेख हिन्दी पाठकों के लिये जो मेरी ही तरह इस बिल के बारे में ज्यादा जानना चाहते हैं



सुना कि अन्ना हजारे अनशन पे बैठे हुए हैं। लगा कि समझना चाहिये कि आंखिर मुद्दा क्या है। और जब समझा तो लगा कि दरअसल ये मुद्दा तो हमारे अपने जीवन से जुड़ा है। लोकपाल विधेयक एक ऐसा विधेयक जो सन 68 में पहली बार संसद के सदन में लाया गया और तबसे अब तक हमारे राजनेताओं की निरंकुशता का शिकार होता रहा। अगली बार अगली बार करते करते पूरे आठ बार उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। और ऐसा करने की एकमात्र वजह यही थी कि ये विधेयक राजनेताओं की भ्रष्ट मानसिकता पर सवाल उठाने की जेहमत कर रहा था। ये विधेयक कह रहा था कि प्रधानमंत्री सहित सारे मंत्री संत्री इसकी जद में आयेंगे और अगर उनके खिलाफ शिकायत हो तो उनपर जांच बैठाई जाएगी और दोशी पाये जाने पर उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाई भी की जाएगी। लेकिन वो लोग भला इस बात को कैसे मान लेते जो नेता ही इसी बिसात पे बनते हैं कि ऐसा करके वो अपनी और अपने आने वाली पुश्तों का आर्थिक उद्धार कर सकेंगे। और ऐसा कोई भी उद्धार बिना घोटालों के सम्भव नहीं होता। ऐसे में जब भी बिल राज्यसभा और लोकसभा में लाया जाता तो ये कह कर उसे खारिज कर दिया जाता कि अभी इसमें सुधार की जरुरत है।  


   गांधी जी इस बात को पहले ही समझ चुके थे कि जनता के सेवकों की करतूतों पर कार्रवाई करने के लिये ऐसे किसी नियंत्रक की जरुरत है जिसके पास यथोचित अधिकार हों। जो जनता के सिवाय और किसी के लिए जवाब देह ना हो। अपने बड़े सकारात्मक उदगार में उन्होंने कहा था कि भ्रष्टाचार एक दिन दूर जरुर होगा भले ही इसे छुपाने की कितनी ही कोशिशें कर ली जायें। और जनता अपने कर्तव्य एवं अधिकार के तहत अपनी न्यायसंगत शंकाओं के लिये अपने सेवकों यानि नेताओं पर कड़े फैसले ले सकती है, उन्हें बर्खास्त कर सकती है, उन्हें कठघरे में खड़ा कर सकती है या फिर उनके व्यवहार की जांच करने के लिये किसी प्रशासक को नियुक्त कर सकती है। ये बात महात्मा गांधी ने 1928 में कही और इसके 40 साल बाद संसद में ऐसे ही किसी विधेयक की सुगबुगाहट हुई। लेकिन 2जी स्कैम और कौमनवैल्थ घोटाले से लेकर चारा घोटाला, बोफोर्स घोटाला, सत्यम घोटाला से होते हुए घोटालों की फेहरिस्त इतनी लम्बी होती चली गई कि अपने गिरेबान में झांकना तो दूर उस ओर नजर उठाकर देखना तक हमारे राजनेताओं को बहुत महंगा लगने लगा। ऐसे में खुद वो एक ऐसे विधेयक को मंजूरी दे दें जो उनकी इन काली करतूतों पर प्रश्न करता हो ये खुद के लिये कब्र खोदने जैसा काम था। जाहिर तौर पर अपनी कब्रें खोदना किसे अच्छा लगता है। 


लेकिन अब जब फिर से इस विधेयक को लाने की बात हो रही है तो उसके मसौदे में कुछ अंदरुनी खामियां बुद्धिजीवियों को नजर आ रही हैं। मसलन ये कि लोकपाल तीन लोगों की एक समिति होगी जिसका चेयरमैन सुप्रीम कोर्ट का रिटायर्ड मुख्यन्यायाधीश होगा और उसके साथ दो और न्यायाधीश रह चुके लोग इस समिति के सदस्य होंगे। लेकिन जिस तरह से हालिया खुद एक मुख्य न्यायाधीश के जी बालकृश्णन भ्रष्टाचार के आरोपी पाये गये उससे इस बात पर सवाल खड़े हो गये कि क्या लोकपाल के पद पर ऐसे लागों का आसीन होना इस पद को पारदर्शी बनाये रख पाएगा? अगर इन्डिया अगेंस्ट करप्सन की साईट पर जाकर इस मसौदे की आलोचना देखें तो साफ लगता है कि इस बिल का मौजूदा ड्राफट बिल्कुल कमज़ोर और प्रभावहीन है। अव्वल तो ये कि इन तीन लोगों को चुनने वाली जो चयन समिति होगी उसमें ज्यादातर लोक सत्ता में बैठे लोग होंगे। उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, दोनों सदनों के नेता, दानों सदनों में विपक्ष के नेता, कानून मंत्री और गृहमंत्री इस चयन समिति में होंगे। माने ये कि उपराष्ट्रपति के अलावा सारे सदस्य राजनेता ही होंगे। दूसरा ये कि प्रधानमंत्री के खिलाफ कोई भी कार्यवाई सदन के सदस्यों द्वारा तय की जाएगी। वो सदन जिसमें बहुमत उसी प्रधानमंत्री के दल का होगा। तीसरा ये कि लोकपाल खुद किसी आरोपी के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर सकते वो सम्बधित संस्था को कार्रवाई के लिये आदेशित भर कर सकते हैं। चौंथा ये कि आम जनता कोई शिकायत दर्ज नहीं करा सकती। पांचवा ये कि जो व्यक्ति शिकायत दर्ज करायेगा उसकी शिकायत झूठी होने पर उसे कड़े दंड के प्रावधान हैं और ये दंड खुद लोकपाल तय करेंगे जबकि यदि आरोप सही निकलते हैं तो आरोपी के खिलाफ दंड तय करने का अधिकार लोकपाल को नहीं होगा। छटा ये कि लोकपाल खुद से यानि सुओ मोटो किसी पर कोई एक्शन नहीं ले सकता। सातवां ये कि लोकपाल केवल एमपी, मिनिस्टर या फिर प्रधानमंत्री के खिलाफ ही जांच करवा सकते हैं किसी अधिकारी के खिलाफ नहीं। आठवां ये कि प्रधानमंत्री के खिलाफ यदि कोई विदेश, रक्षा या सुरक्षा से जुड़े मामले पर आरोप हैं तो लोकपाल उनपर जंाच नहीं करवा सकता और ये भी कि लोकपाल महज एक सलाकार समिति होगी उसको खुद किसी कार्रवाई को शुरु करने के अधिकार नहीं होंगे। इस तरह अगर मौजूदा मसौदे को देखें तो उसमें कोई दम ही नज़र नहीं आता।


   ऐसे में जनलोकपाल बिल का जो मसौदा प्रशान्त भूषण, किरण बेदी, जेएम लिंगदोह, शान्तिभूषण, अरविन्द केजरीवाल जैसे लोगों ने तैयार किया है वो मौजूदा बिल को जनता के हित में और प्रभावशाली बनाने की एक अच्छी पहल लगती है। इस ड्रªाफट में लोकपाल की चयनसमिति में नोबेल और मैग्सेसे पुरस्कार प्राप्त भारतीय मूल के लोगों, भारत रत्न से सम्मानित लोगों, मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, उच्च और सर्वोच्च न्यायालय के दो दो सीनियर मोस्ट न्यायाधीशों और दोनांे सदनों के सभापतियों को शामिल करने की बाद की गई है जिससे ये चयनसमिति एक बेहद सन्तुलित समिति लगती है। इस समिति की चयनप्रक्रिया को भी पारदर्शी बनाये जाने का उल्लेख इस ड्राफट में है साथ ही आम आदमी को शिकायत दर्ज कराने का हक मुहैय्या कराने की बात भी ये ड्राफट करता है। सरकार द्वारा प्रस्तावित विधेयक की तुलना में ये संशाधित विधेयक कहीं ज्यादा प्रभावशाली मालूम होता है। 


     अन्ना हजारे के नेतृत्व में पूरे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ जो मुहिम खड़ी हो रही है उससे कुंद होते जनान्दोलनों को एक बार फिर धार मिली है। लेकिन एक तबका है जो इस आधार पर अन्ना हजारे को समर्थन देने से इनकार कर रहा है कि वो कौर्पोरेट्स और विपक्षी राजनैतिक दल के एजेंडे को सेट करने का काम कर रहे हैं। ऐसे लोगों के सामने यही तर्क रखा जा सकता है जो देश वर्ड कप जीतने पर तिरंगा उठाकर समझ रहा था कि उसका कर्त्तव्य पूरा हो गया उसका कुछ अंश ही सही आज भ्रष्टाचार के खिलाफ तिरंगा उठा रहा है तो इसके पीछे उस बूढे आदमी का कुछ तो योगदान है ही। और वो योगदान आज दिल्ली, मुंम्बई और देश के अलग अलग कोनों की सड़कों पर दिखाई दे रहा है जिसे नकारा नहीं जा सकता। यहां हम किसी व्यक्ति को समर्थन दें या ना दें लेकिन जो मुद्दा इस आंदोलन में उठाया जा रहा है वो एक ऐसा मुद्दा है जिससे आम आदमी का जीवन जुड़ा है। इस आन्दोलन को समर्थन देना कहीं न कहीं उस जीवन को समर्थन देने जैसा ही है। 


(कुछ महत्वपूर्ण लिंक जो इस मुददे को समझने में मदद करेंगे)


http://www.scribd.com/doc/21632406/Lok-Pal-Bill-An-Analysis


http://indiaagainstcorruption.org/

Sunday, March 6, 2011

एक गीत, एक म्यूजिक वीडियो और एक बात



उन लोगों के हाथ में एक वोटर लिस्ट थी। जिससे वो पता कर रहे थे कि कौन सा सिख किस घर में रहता है। जैसे ही वो एक परिवार को मौत के घाट उतारते वो लिस्ट से उसका नाम काट लेते। उनमें से ज्यादातर पढ़े लिखे नहीं थे। और जो कुछ एक पढ़े लिखे थे उनके हाथ में लिस्ट थी। बाकि लोगों के पास तलवारें थी। इस तरह एक एक करके दिल्ली के अलग अलग कोनों से हज़ारों सिख मौत के घाट उतार दिये गये। और ये सब एक बड़ी राजनैतिक पार्टी के संरक्षण में हुआ जो अपने आप को सेक्यूलर कहती है। ये भीषण नरसंहार इन्दिरा गांधी की उनके सिख बौडीगार्डस द्वारा की गई हत्या का प्रतिवाद थी। 

इन्दिरा गांधी की मौत के बाद भारत में चौरासी के जो दंगे हुए उनके दोशियों को आज तक सजा नहीं मिली। बावजूद इसके कि इस बड़े घृणित कहे जा सकने वाले नरसंहार में 4000 से ज्यादा सिख मौत के घाट उतार दिये गये। बल्कि मानवाधिकारों पर काम करने संगठन 10 से 17 हज़ार सिखों की मौत का दावा करते हैं। इस दुर्घटना के लगभग 27 साल बाद अब तक 9 कमीशन दंगों की जांच के लिये बैठाये जा चुके हैं जो फिलवक्त ये फैसला करनेे में सक्षम नहीं हैं कि इन दंगों का दोशी आंखिर था कौन। 

हमारे देश की एक खास बात है कि यहां हर बात में विविधता पाई जाती है। यही विविधता नफरत, नरसंहार और दंगाईयों की मानसिकता में भी है। ये विविधता कभी गोधरा, कभी बाबरी, कभी सिखविरोधी तो कभी तमिल विरोधी दंगों में देखने को मिल जाती है। यहां कभी मुंम्बई में भैयाओं के साथ मारपीट होने लगती है तो कभी उड़ीसा में ईसाईयों की हत्या कर दी जाती है। लेकिन इन सारी घटनाओं या दुर्घटनाओं के पीछे एक मान्यता जो सबसे अहम उत्प्रेरक की भूमिका अदा करती है वो है क्रिया की प्रतिक्रिया। इस एक अकेले तर्क पर सभी हिंसक वारदातों को जस्टिफाई करने की कोशिश की जाती है। और सिख विरोधी दंगों या फिर गोधरा जैसे मामलों में ऐसी घटनाओं को एक पूरा स्टेट, पूरा सिस्टम जस्टिफाई करता दिखाई देता है। 

महात्मा गांधी ने एकबार एक बात कही थी An eye for an eye makes the whole world blind.  यानि कि किसी ने अगर गलत किया है तो उसके जवाब में एक ऐसी ही बड़ी गलती करना कोई समझदारी का काम नहीं है। दंगा या नरसंहार कभी भी किसी समस्या का मानवीय हल नहीं हो सकता। इस तरह की हिंसक वारदातों का इलाज रब्बी शेरगिल के एक गीत में दिखाई देता है। ये म्यूजिक वीडियो रब्बी शेरगिल के इस गीत और महात्मा गांधी के उस कोटेशन के मूल विचार के साथ चौरासी के सिख विराधी दंगों को केन्द्र में रखकर बनाया गया है।  

निर्माता - शशांक वालिया, उमेश पंत, सोनिया वालिया, कदीर अहमद
एमसीआरसी जामिया मिल्लिया इस्लामिया