Monday, December 17, 2012

अनजान शहर में पहचान की तलाश

साप्ताहिक अखबार गांव कनेक्शन (16  से 22 दिसम्बर)  में प्रकाशित

मुम्बई के अंधेरी स्टेशन के भीतर उस ओवरब्रिज पर भागती भीड़ का न कोई सर पैर है, न कोई ओर छोर। अजनबी अनजान चेहरों में पहचान तलाशने की तमाम कोशिशें जब हारकर लौटती हैं तो अपना पीछे छूट गया कस्बा याद आता है। स्टेशन से गुजरती कोई भी लोकल टेªन उस कस्बे की ओर नहीं लौटती। 

कितनी आसानी से चिलचिलाती सर्दी की सिहरनें गंधाते पसीनों की बू में खो गई हैं। अपने घर से दूर इस शहर का तापमान कभी शून्य से नीचे नहीं जाता। काली रात को चीरकर आती सुबह की रोशनी में बर्फ की कतरनें दूर पहाड़ों पर टहलती नहीं दिखाई देती। बचपन में बर्फ से बनाई 3 फीट उंर्ची मूर्तियां दूषित हवा में घुलकर बूंद बूदं बिखर सी गई लगती हैं। और उन बूंदों के सांथ कई स्मृतियां नौस्टेजिया की शक्ल में वक्त के आईने पर भाप बनकर जम सी गई लगती हैं। उस भाप को साफ करके घर लौटने का मन होता है कभी कभी।   

गांव के खेतों में बेलों से उचक उचक कर तोड़ी हुई ककडि़यों का स्वाद सब्जी मंडी के बासी खीरे से शहर आने की वजह पूछता है। छत पर बिछाई नीली बरसाती के उपर सूखती मां के हाथों की बनाई बडि़यां ग्यारहवें माले की खिड़की से झांकने पर कहीं नज़र नहीं आती। किचन में लगे एक्वागार्ड से बहकर आती पानी की पतली धार पांच पांच लीटर के उन जरकिनों की याद दिलाती है जो बचपन में घर से दूर नौले से भरकर लाये जाते थे। तब जो पानी भरने जाना तफरी सा लगता था अब वो गम्भीर समस्या सा नज़र आने लगा है। 

हमारे नौस्टेजिया का हिस्सा वो छोटा सा कस्बा, वो छोटा सा गांव जो तब खूबसूरत लगता था, अब वो बस यादों की दहलीज़ से झांकता ही अच्छा लगता है। उस दहलीज को पारकर न हम उससे हाथ मिलाना चाहते हैं और न ही वो उस दहलीज को लांघकर हम तक पहुंच पाता है। शहर की अपार्टमेंट संस्कृति को आत्मसात कर लेने के बाद गांव की वो बाखलियां कुछ दिनों की छुटिटयां बिताने के दौरान खींची हुई तस्वीरों में ही अच्छी लगती हैं। चटक नीले आकाश के नीचे हरे जंगलों के पीछे से झांकते हिमालय की वो तस्वीरें फेसबुक एलबम में डालकर लाईक्स जुटाने भर तक प्रासांगिक रह गई हैं हमारे लिये। 

भाई, बहन और यहां तक कि मां भी रोजगार के सिलसिले में उस घर से दूर आ गई है जिसे पापा मम्मी ने अपने संघर्ष के दिनों में तनख्वाह के पैसे बचा बचाकर बनाया था। पापा जो तब अपने पुश्तैनी घर के पास रहने के खतिर अपनी नौकरी छोड़कर चले आये थे वो अब वहां अकेले रह गये हैं। कभी कभी जब वो मिलने के लिये बम्बई चले आते हैं तो हफ्ते भर से ज्यादा उनका मन नहीं लगता। वो इतने रुखे शहर से सामन्जस्य नहीं बैठा पाते जहां सोलहवें माले पर रहने वाले किसी बुजुर्ग की मौत की खबर सातवें माले पर रहने वाले को सोसायटी के नोटिसबोर्ड पर पढ़कर पता चलती हैं। वो उस संस्कृति से आते हैं जहां बीमारियों के दिनों पड़ौसी बस हाल चाल ही नहीं पूछते बल्कि ये तक जानते हैं कि किस वक्त कौन सी दवा कितनी मात्रा में दी जानी है। दवाओं के लिफाफे में बाकायदा कुछ घरेलू नुस्खे और भर जाते हैं। उस परम्परा से आये पापा को हफते भर में ये शहर अजनबी कर देता है। 

हफतेभर बाद घर लौटकर दिन में दूसरी बार फोन करते हुए वो झिझकते हुए पूछते हैं कि बेटा बिज़ी तो नहीं हो? फोन पर उनके बूढ़े होते जा रहे गले की खरांश में किसी बीमारी की आहट पाकर दिल कांप जाता है। कहीं उन्हें कुछ हो गया तो? तब तब एक अपराधबोध दिलो दिमाग पर हावी हो जाता है। उन्हंे इस तरह अकेला छोड़ देने का गिल्ट सर में दर्द करने लगता है। 

औफिस में छुटटी के लिये डाले गये ईमेल के जवाब जब इनबौक्स में नहीं लौटते तो नौकरियों के इस शहर को छोड़छाड़कर तसल्लियों के अपने गांव लौट जाने का मन करने लगता है। मन करने लगता है कि किस तरह उस कस्बे को लौटने लायक बनाया जाये। इस लायक बनाया जाये कि नौकरियों के पीछे भागते हुए, शहर चले आने की नौमत ही न आये। 

Sunday, November 25, 2012

कितना जायज़ है मौत का मज़ाक



इस बीच फेसबुक पर दो मसलों को लेकर प्रतिक्रियाओं का अनवरत दौर जारी है। बाला साहब ठाकरे का देहावसान और अजमल कसाब को गुपचुप दी कई फांसी। इन दोनों ही विषयों में यूं तो तुलना करने के लिये कुछ भी समानता नहीं है पर इन पर आ रही प्रतिक्रियाओं में जो एक बात कौमन है वो है इन पर की जा रही बेहद असंवेदनशील टिप्पणियां। 

फेसबुक पर इन मौतों को लेकर तमाम तरह के मज़ाक किये जा रहे हैं। लोगों ने यहां तक लिखा है कि बाला साहब ठाकरे का साथ देने के लिये कसाब को यमराज ने अपने पास बुला लिया। इन टिप्पणियों का स्तर बेहद सतही और एक हद तक फूहड़ है। 

ये बात समझने की है कि फेसबुक इस दौर में संचार के एक महत्वपूर्ण माध्यम के तौर पर उभर रहा है। इस माध्यम को भले ही संचार का जिम्ेमदार और गम्भीर माध्यम न माना जाता हो पर इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि इसकी पहुंच का स्तर अब बहुत व्यापक हो चला है। इसीलिये इस पर की गई कोई भी टिप्पणी प्रत्यक्ष रुप से ना सही पर अप्रत्यक्ष रुप से विचारों में बहुत कम ही सही पर असर ज़रुर छोड़ती है। 
 मास मीडिया की एक थेरी है- बुलेट थेरी। इस थेरी का सार यही है कि लोगों पर आप जिस तरह की सूचनाओं की जितनी अधिक बौछार करेंगे लोगों के माईन्डसेट में उसी तरह से बदलाव होता रहेगा। इस बदलाव की गति भले ही बहुत धीमी हो लेकिन कहीं न कहीं आपको दी गई किसी भी तरह की सूचना आपके सबकौन्सियश में कोई न कोई असर डालती ज़रुर है। 

मौत चाहे किसी की भी हो वो खुशनुमा तो कतई नहीं हो सकती। उस पर अटटहास करना असभ्यता की ही निशानी है। युवा साहित्यकार गौरव सोलंकी की टिप्पणी इस संदर्भ में बहुत सार्थक मालूम होती है। वो कहते आप जो मौत पर चुटकुले गढ़ सकते हैं, मुझे आपसे बहुत डर लगता है। वाकई मौत पर चुटकुले गढ़े जाने की ये परंम्परा एक बेहद गैरजिम्मेदाराना और असंवेदनशीन आभासी समाज की नीव डाले जाने की प्रक्रिया का अंग है। एक ऐसा समाज जिसके लिये कुछ भी कह देना बहुत आसान है पर उसका दूरगामी असर क्या हो सकता इसकी कल्पना तक करना बहुत मुश्किल। 

पुलिसिया महकमों ने इस बीच जिस अलोकतांत्रिक तरीके से फेसबुक पर सरकार या फिर सरकारी महकमे में प्रभाव रखने वाले लोगों के खिलाफ फेसबुक पर टिप्पणी करने वाले लोगों को गिरफत में लेने की कोशिश की है उससे ये बात साफ हो जाती है कि वो भी इन माध्यमों पर की जाने वाली टिप्पणियों के दूरगामी असर से अच्छी तरह वाकिफ हैं। इस बाबत भले ही सरकार या पुलिस को आम आदमी की अभिव्क्ति की स्वतंत्रता का हनन करने का कोई नैतिक अधिकार ना हो, पर टिप्पणी करने वाले लोगों को भी एक नैतिक आत्म नियंत्रण की ज़रुरत से इनकार नहीं करना चाहिये।  

हम अपनी टिप्पणियों में जिस तरह की हिंसक और अभद्र किस्म की भाषा का प्रयोग करने लगे हैं, उसे बढ़ावा दिया जाना उस सामाजिक तानेबाने के लिये खराब है जिसमें अब भी मौत जैसी दुखद घटनाओं के लिये संवेदनाएं जि़ंदा है। 

सोशियल नेटवर्किग वैबसाईटस में अपनी त्वरित प्रतिक्रियाऐं पोस्ट कर देने की इन आदतों के चलते इस दौर में हम जिस बात को सिरे से खारिज कर रहे हैं वो ये है कि हमारे समाज को बुरे इन्सानों से जितना खतरा है उससे कई गुना ज्यादा खतरा बुरी सोच से है। केवल उस इन्सान के चले जाने से उसकी सोच भी खत्म हो जाये, ये ज़रुरी नहीं है। उस सोच को खत्म करना समाज के नागरिक होने के नाते हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। लेकिन जब हम उस व्यक्ति की मौत का उत्सव मनाने लगते हैं तो हम कहीं न कहीं उसी हत्यारी मानसिकता का अंग बन जाते हैं जो अजमल कसाब जैसे लोगों को बम धमाके करके कई मासूम जानें निगल लेने के लिये उकसाती है। 


हमारा राष्टीय मीडिया भी इन विषयों की कवरेज करते हुए इतने आक्रामक तरीके से पेश आता है कि लगता है कि किसी की मौत मीडिया के लिये टीआरपी बटोरने के एक साधन से ज्यादा कुछ भी नहीं है। दर्शकों को शायद ये समझाने की ज़रुरत है कि कसाब जैसे लोगों को दी गई फांसी दरअसल उस हिमाकत को दी गई फांसी है जो अपने आतंकवादी इरादों के चलते दहशत फैलाकर सामाजिक शान्ति को भंग करना चाहती है। न कि एक व्यक्ति मात्र को दी गई फांसी जो कि किसी देश का नागरिक या किसी मां का बेटा है।  

किसी की मौत पर टीका टिप्पणी करते हुए हमारी संवेदनाओं का मर जाना कहां तक जायज़ है, कोई भी टिप्पणी करने से पहले हमें इस बारे में एक बार ज़रुर सोचना चाहिये।

Thursday, October 4, 2012

जिन्दगी की कोचिंग क्लास हैं स्टीव जौब्स की बातें


स्टीव जौब्स का व्यकितत्व मुझे जिन्दगी की कोचिंग क्लास की तरह लगता है। उनके बारे में पढ़ते चले जाना जि़न्दगी को सीखते चले जाने की तरह है। 

आविष्कार ही वो चीज़ है जो एक लीडर को एक फौलोवर से अलग करती है। स्टीव जौब्स की कही ये बात इसलिये अहम हो जाती है क्योंकि उन्होंने जो कहा वो अपने खुद के अनुभवों के आधार पर कहा। उनकी कही हर बात को उनकी जिन्दगी के अलग अलग हिस्सों में झलकते हुए देखा जा सकता था। 

Published in I-Next, 5-9-12
एक छोटे से गैरेज की चाहरदीवारी से की हुर्इ एक छोटी सी शुरुआत कैसे पूरी दुनिया को चौंका देती है, और फिर चौंकाने का एक सिलसिला सा शुरु हो जाता है, दुनिया उस आविश्कारक के पैदा किये हुए एक मिराज से निकल भी नहीं पार्इ होती है, कि वो दूसरा मिराज सामने खड़ा कर देता है, फिर तीसरा फिर चौथा और ये सिलसिला उस आविश्कारक की आंखिरी सासें लेने तक नहीं थमता। 

तकनीक की दुनिया में एप्पल और स्टीव जौब्स आज एक्सीलेंस के पर्यायवाची माने जाते हैं। दुनिया का सबसे बेहतरीन पर्सनालार्इज्ड कम्प्ूटर बनाने वाले उस आदमी को तकनीक की दुनिया का भगवान बनाने के पीछे जो एक चीज़ सबसे बड़ी भूमिका निभाती है वो है उसका विज़न।  

स्टीव जौब्स ने अपने बारे में लिखा है कि पिछले 33 सालों से जब भी मैं आर्इने के सामने खड़ा होता हूं, मैं यही सोचता हूं कि आज अगर मेरा आंखिरी दिन होता तो क्या मैं वही कर रहा होता जो मैं आज करने वाला हूं। मेरा जवाब अगर ना में होता है तो अगले कर्इ दिनों तक मुझे पता होता है कि मुझे किसी बदलाव की ज़रुरत है। 

हम अक्सर अपनी निज़ी जि़न्दगी में आये दुखों का हवाला देकर अपनी सारी असफलताओं और हताशाओं को जसिटफार्इ करने की कोशिश करते हैं। स्टीव जौब्स की जि़न्दगी की कहानी पलक झपकते ही अपनी असफलताओं के पीछे दी गर्इ हमारी दलीलों को सिरे से खारिज कर देती है। स्टीव जौब्स के पैदा होने से पहले ही उनके माता पिता उन्हें किसी और को गोद देने की कागज़ी कार्रवार्इ कर चुके थे। एडौप्शन के कागज़ों पर सार्इन करते वक्त जब उनके नये माता पिता को पता चला कि उनके बायलौजिकल पैरैन्टस ग्रैजुएट नहीं हैं तो उन्होंने उस नवजात को ये सोचकर गोद लेने से मना कर दिया कि स्टीव जौब्स भी पढ़ने लिखने में कमज़ोर निकलेंगे। लेकिन उन्हें क्या पता था कि वो एक जीनियस को गोद लेकर तकनीकी दुनिया के स्वर्णिम इतिहास का हिस्सा बन रहे हैं।  

कुछ ऐसा ही तिरस्कार उन्हें तब भी झेलना पड़ा जब एप्पल ने उन्हें नौकरी से निकाल दिया। जान स्कली नाम के जिस शख्स को उन्होंने एप्पल में जगह दी उसी शख्स ने स्टीव जौब को पिंक सिलप देकर उन्हें कम्पनी के बाहर का रास्ता दिखा दिया। 

लेकिन अपने जन्म से पहले ही तिरस्कृत कर दिये गये उस शख्स ने केवल 56 सालों की अपनी जीवनयात्रा में ये साबित कर दिया कि वो तिरस्कार के नहीं बलिक सर आंखों पर उठाये जाने के हकदार थे। 

आज स्टीव जौब्स का नाम लिये बिना तकनीकी जगत की शब्दावलियां अधूरी रह जाती हैं। उन्होंने जिस इंटेलिजैंस से कम्प्यूटिंग की उलझी हुर्इ तकनीकों को छोटे छोटे डब्बों में समेट दिया वो उनके जैसा कोर्इ जीनियस ही कर सकता था। आर्इ पौड, आर्इ पैड और आर्इ फोन जैसे जादुर्इ तकनीकी आविष्कारों को सम्भव बनाते समय स्टीव जौब्स की सोच यही रहती थी कि जो वो बना रहे हैं उससे बेहतर कोर्इ सोच भी ना सके। वो अपने इंजीनियर्स को अक्सर यही कहते थे कि जो हम बना रहे हैं उसके लिये लोग केवल टैम्प्ट ही न हों बलिक वो चीज़ इतनी खूबसूरत हो कि लोगों का उसे चाटने तक का मन हो। ये बात सुनने में कुछ अटपटी लग सकती है पर इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि वो अपने उत्पादों में किस स्तर की क्वालिटी देखना चाहते थे। वो मानते थे कि आप अपने ग्राहकों से ये नहीं पूछ सकते कि वो क्या चाहते हैं और फिर आप उसे वो बना के दें जो वो चाहते हैं। क्योंकि जब तक आप उनकी पसंद का प्रोडक्ट उन्हें बना के देंगे तब तक वो कुछ नया चाहने लगेंगे। शायद इसी समझ ने उन्हें समय से बहुत आगे तक की सोचने की काबिलियत दी। और इसी काबिलियत के बूते उन्होंने अपने कस्टमर्स को वो प्रोडक्ट बना के दिये जिनकी कल्पना भी उनकी समझ से बहुत दूर थी। 

अपने समय से आगे सोचने वाले स्टीव जौब्स हमेशा ये मानते रहे कि आप केवल आगे देखकर बिन्दुओं को नहीं जोड़ सकते। उन्हें जोड़ने के लिये आपको पीछे देखना होगा। और ये भरोसा रखना होगा कि भविष्य में उन्हें जोड़ा सकता है। आपको किसी चीज़ पर भरोसा रखना होगा। चाहे आप उसे भाग्य कहें, जि़न्दगी कहें या अपने कर्म। 

स्टीव जौब्स कहते थे कि आपका समय सीमित है इसे किसी और की जि़न्दगी जीने में व्यर्थ मत करो। अपने बारे में दूसरों की बनार्इ हुर्इ राय से पैदा हुए भ्रम के जाल में मत फंसो। दूसरे लोगों की राय से पैदा हुए शोर के सामने अपने भीतर की आवाज़ को मत दबने दो। और इससे भी ज़रुरी है कि इतना साहस रखो कि अपने दिल और अपने इन्टयूशन दोनों की बात मान सको। 

अपने आंखिरी वक्त में कैंसर से जूझते हुए स्टीव जौब्स जानते थे कि उनके पास बहुत कम वक्त बचा है। शायद कुछ महीने। इसीलिये वो वक्त को अपनी पसंदीदा चीज़ों में मानते थे। उन्होंने हर दिन को अपनी जिन्दगी का आखिरी दिन माना इसीलिये उन्हें एक एक लमहा ज़रुरी लगता रहा। उन्होंने कहा भी था कि मेरी जिन्दगी की सबसे पसंदीदा जीजें पैसे से खरीदी हुर्इ चीज़ें नहीं हैं। हमारी जिन्दगी का जो सबसे कीमती रिसोर्स है वो वक्त है। 

Saturday, September 15, 2012

अफवाहें गढ़ती वर्चुअल दुनिया


फेसबुक जैसी नेटवर्किंग सार्इट पर फैली अफवाह ने बैंग्लौर से लगभग 3 हज़ार उत्तर भारतीय लोगों को अपने अपने घरों की ओर जाने को मजबूर कर दिया। इस घटना ने एक अजीब सा डर पैदा किया है जिसे आपसे साझा कर रहा हूं।

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इन दिनों इन्टरनेट के सामने बैठे बैठे अक्सर मैं सोचता हूं कि कहीं हमें दरवाजों में बंद होने की आदत तो नहीं हो रही? कभी कभी  लगता है कि मेरे आस पास कर्इ किस्म के दरवाजे हैं जो बंद रहते हैं। खिडकियां जो कभी नहीं खुलती। कर्इ बार लगता है कि हम मुंह से ज्यादा उंगलियों से बात करने लगे हैं। उंगलियां जबान की तरह चलने लगी हैं और होंठ खामोश रहने लगे हैं।

मेरी आंखों के सामने खुली नेटवर्किंग वैब्सार्इटस की खिड़कियों में सैकड़ों लोग मेरे सामने होते हैं लेकिन फिर भी हमेशा ऐंसा ही लगता है कि ये लोग बहुत दूर हैं और इनका पास होना एक भ्रम है। उस समय मुझे डर लगने लगता है। वो सारी बातें झूठ लगने लगती हैं जो उंगलियों ने अभी अभी ना जाने कितने लोगों से कही और मेरी आंखों ने सुनी हैं। मैं डर जाता हूं कि कहीं ऐसा तो नहीं कि मेरी आखों के सामने मेरे सैकड़ों दोस्तों की ये आभासी जमात एक कोरा झूठ है। और एक दिन  मैं इनके साथ जीता हुआ महसूस करने  लगूंगा कि मैं कितना अकेला हूं।

कहना सुनना लिखने और पढ़ने में तब्दील होने लगा है और आवाज......आवाज तो जैसे कानों में बहनी ही बंद हो गर्इ है।  अपनों की बातों की एक मीठी नदी जो अब कानों में नहीं बहती। दोस्त बढ़ते जा रहे हैं पर मिलना जुलना बंद होता जा रहा है। ये सब कुछ कर्इ बार बड़ा रुखा सूखा सा लगने लगता है। हम कुछ भी कह जाने लगे हैं क्योंकि सामने वाला क्या कहेगा क्या सोचेगा इसकी फिक्र होनी अब बंद हो गर्इ है। वो क्या लिखेगा ये उतना मायने नहीं रखता क्योंकि अन्ततह उस लिखावट की वर्चुअल उपसिथति सार्इन आउट भर कर देने पे नेस्तनाबूत हो जायेगी। उसका होना न होने में बदल जायेगा। फिर जो लिखकर कहा गया था वो शून्य हो जायेगा।

   मुझे शंका है कि लिखते लिखते लोगों के करीब चले जाने की ये आदत बहुत खतरनाक साबित हो सकती है। हमारे शब्द हमें लोगों के बेहद निजी और नितान्त व्यकितगत संसार में पहुचा देने का भ्रम पैदा करने लगे हैं। हमारा मानवीय असितत्व विन्डोज़ के किसी सार्इडबार में में मौजूद चैट लिस्ट के एक कोने में चस्पा किया जाने लगा है। मुझे डर है एक दिन जब मैं वहां नहीं रहूंगा तो मान लिया जायेगा कि मैं कहीं नहीं हूं। हो सकता है कि लोग कुछ दिनों मुझे र्इमेल या स्क्रैप भेजकर जानना चाहेंगे कि मैं हूं भी कि नहीं, ज्यादा हुआ तो मेरी दीवार पे कुछ लिख दिया जायेगा। कम बैक, मिस यू, टी सी या ऐसे ही छुटपुट दो शब्द। मैं इन दो शब्दों के जवाब में दो शब्द नहीं लिखूंगा और कहीं का नहीं रह जाउंगा। कुछ लोग शायद कुछ दिन चिंता करेंगे और फिर भूल जायेंगे क्योंकि चिन्ता करने से बेहतर वो अपनी फ्रेंडलिस्ट में मौजूद सैकड़ों लोगों से रुबरु होना पसंद करेंगे। क्योंकि लोगों के पास अपने लिये इतना कम समय है कि चिन्ता करने जैसी चीजें उनके लिये सबसे निचली वरियता में रहेंगी। और निचली वरियता की चीजों का महत्व इस दौर में बिल्कुल खत्म हो गया है।
अभी कुछ ही दिनों महीनों मेरे एक दोस्त के औकर्ुट अकाउंट से उसकी फ्रेंडलिस्ट के लगभग 250 लोगों को एक बेहद अश्लील कहा जा सकने वाले सेक्स टेप का वीडियो भेजा गया। उस अकाउंट में उसका नाम था। उसकी तस्वीर थी। माने उसने ही लगभग ढ़ार्इ सौ लोगों को ये सेक्स टेप भेजा था। उसने बताया कि मैने ऐसी कोर्इ चीज लोगों को भेजी ये मुझे भी तब पता चला जब मेरे भार्इ का मुझे फोन आया और उसने ये कहा कि तुम्हारा अकाउंट किसी ने हैक कर लिया है। भार्इ ने ये कहा क्योंकि वो जानता था कि मैने इस तरह की कोर्इ अश्लील सामाग्री उसे नहीं भेजी हो सकती। लेकिन वहीं मेरी एक पुरानी दोस्त ने उस स्क्रैप पर रिप्लार्इ किया कि तुम्हें क्या हो गया है। ठीक तो हो? ये क्या क्या भेजने लगे हो?एक अन्य अन्जान ने जिसकी फ्रेंड रिक्वेस्ट को मैने बिना ये जाने एक्सेप्ट कर लिया था कि वो कौन है, ने मुझे लिखा रिमूव द पोस्ट अदरवार्इज आर्इ विल कौल सार्इबर पुलिस। फिर मेरे भतीजे का फोन आया कि चाचा आपके अकाउंट से एक बड़ी गंदी चीज आर्इ है। तब तक उसे पता चल चुका था कि वो चीज आंखिर है क्या। एक ऐसी जीच जो उसने कभी भेजी ही नहीं, उसके नाम से ढ़ार्इ सौ लोगों को भेज दी गर्इ और उनमें से लगभग सौ लोगों के लिये वो बदल गया। पर अपने लिये उनकी राय बदल जाने के कारणों में वो खुद कहीं नहीं था।

यही एक डर की सिथति है। कि हम कैसे दिखतें हैं, कैसा सोचते हैं वगैरह  इस बात से तय होने लगा है कि हमारा प्रोफार्इल हमें कैसे पोर्टे करता है। एक दिन जब हमारे बदले कोर्इ और हमारे प्रोफार्इल को मैनेज करने लगेगा, वो जिसे अन्दाजा होगा कि हम लगभग किस तरह के दिखते हैं, किन लोगों को जानते हैं। इतना काफी होगा और हमारा किसी और के द्वारा गढ़ा गया आभासी रुप लोगों के  लिये सच हो जायेगा। क्योंकि तब जो वर्चुअल होगा वो रियल समझ लिया जायेगा।

इस बीच बैंग्लोर में रह रहे उत्तर भारतीयों में जो डर फैला वो किसी न किसी रुप में हम सब के बीच पसर जाएगा। ये वाकया शायद सचेत हो जाने का संकेत है। सार्इबर दुनिया पर अपनी निर्भरता को कम करने का एक सिग्नल शायद।



Friday, September 14, 2012

उधारी की मौज और परेशानियों की नकदी

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मुम्बर्इ में नया नया आया था तो टीवी के एक लेखक से मिलने गया। लोखंडवाला की पौश कौलानी में टूबीएचके लेकर अकेले रहते थे। मतलब ये कि पैसा अच्छा कमाते थे। बातों बातों में उन्होंने बताया जिमिंग, स्वीमिंग, कार जैसे कर्इ नये शौक उन्होंने टीवी की दुनिया में आकर पाल लिये। क्यूंकि अभी पैसा अच्छा मिल रहा था तो र्इएमआर्इ नाम के उस जादुर्इ तरीके ने चीजें आसान कर दी थी। हर महीने कटने वाली इस निर्धारित रकम की मात्रा घर में आने वाली हर नर्इ चीज़ मसलन वाशिंग मशीन, फि्रज, डबल बैड, ड्रैसिंग टेबल वगैरह वगैरह के साथ बढ़ती जली जाती। पैट्रोल की कीमत और कार की मेंटेनेंस सो अलग। ऐसे में रिसते रिसते किश्तें इतनी महंगी हो गर्इ जितनी पिताजी की तनख्वाह हुआ करती थी जिसमें माता जी, पिताजी सहित तीन भार्इ बहनों का परिवार आराम से चल जाता था, और थोड़ी बचत भी हो जाया करती थी। पर साहब को उधारी में जीने की ऐसी लत लगी कि अब महीने में कुछ भी करके इतना कमाना ही है कि किश्तें भरी जा सकें। माने ये कि हर महीने मोटी तनख्वाह का आना लगभग उतना ही जरुरी हो गया है जितना हर पल सांसों का आना।

यही कहानी है बड़े शहरों में रहने वाले लगभग हर दूसरे मिडिल क्लास आदमी की। शहरों का बाज़ार किसी मायाजाल की तरह हमें अपनी ओर खींचता है और इस बाज़ार के गणित का सीधा सीधा समीकरण यही है कि जितना पैसा आप दिनरात की मेहनत करके कमा रहे हो उसको जितनी जल्दी हो सके आपसे खींच लिया जाये। ताकि पूंजी का प्रवाह बेरोकटोक जारी रहे। इस प्रवाह का जारी रहना तब तक तो ठीक है जब तक इसका बुरा असर हमारी जिन्दगी के प्रवाह में ना पड़े। लेकिन मुशिकलें तब खड़ी होती है जब इस प्रवाह को बनाये रखना हमारी मजबूरी बन जाती है। उधारी की जिम्मेदारी हम उठा तो लेते हैं पर ऐसा करते हुए हम उस फंदे को भूल जाते हैं जो इसके एवज में हमारी गरदन पर फिट कर दिया जाता है। और फिर जैसे जैसे आमदनी कम होती जाती है ये फंदा और टार्इट होता चला जाता है।

सुविधापसंद होना कोर्इ गलत बात नहीं है, खासकर तब जबकि आपने अपनी योग्यता के आधार पर सुविधाओं का इस्तेमाल करने की कुव्वत हासिल की हो। लेकिन परेशानी तब होती है जब हम अपनी सुविधाओं की मूलभूत परिभाषा को बाज़ार के हिसाब से या फिर लोगों की देखादेखी बदलने लगते हैं। तथाकथित सोशियल स्टेटस जैसे स्यूडो कौंसेप्टस के झांसे में आकर हम वो सुविधाएं हासिल करने की जुगत में लग जाते हैं जो महंगी हों और दूसरों के पास हों। टीवी और अखबारों में आने वाले विज्ञापन इन झांसों में आने में हमारी मदद करते हैं। ये विज्ञापन पहले दिमाग की बत्ती जलाने जैसी बातें कहकर हमारी अकल का फयूज उड़ा देते हैं, और फिर अपनी अकल लगाने का मशविरा भी देते हैं। ऐसे में इनके हिप्पोक्रेटिक चरित्र को बखूबी समझा जा सकता है।

कहते हैं पांव उतने ही पसारने चाहिये जितनी लम्बी चादर हो। पर ये दौर पुरानी कहावतों को भुला दिये जाने और बाज़ार द्वारा गढ़े गये नये मुहावरों को सर झुकाकर अपना लिये जाने का दौर है। लिव लार्इफ किंग सार्इज़ जैसी पंचलार्इन्स हमें इतना मोह लेती हंै कि फिर अपनी चादर का सार्इज नापने की जे़हमत हम नहीं उठाते। डेबिट और क्रेडिट का अनुलोम-विलोम सीखने के चलते हम जीने की सलाहियत भूल जाते हैं। और अपने आने वाले 5-10 सालों की कुंडली में बिलों की किश्तों को लिख देते हैं, जिन्हें चुकाना हमारी तकदीर में शामिल हो जाता है। और फिर उधारी के बोझ से लदकर वक्त की दीवार पर हमारी जो तस्वीर चस्पा होती है उससे मुस्कुराहट हमेशा हमेशा के लिये गायब जाती है।

आज जब हमारे पास फोन पर लोन ले लेने के इन्तज़ाम मौजूद हैं, हमें बड़ी सावधानी से ज़रुरी और गैरज़रुरी चीज़ों के अन्तर को समझने की ज़रुरत है। ये भी समझना होगा कि ग्लोबल बाज़ार में समाया सुविधाओं का अनन्त हमें कर्जे के बोझ तले रौंद देने की साजिश तो नहीं रच रहा। प्रकि्रति ने वक्त की जो नकदी हमें दी है उसे उधार चुकाने में खर्च कर देना समझदारी तो नहीं है। याद रखियेगा कि कज़ोर्ं की मानसिक दासता में जी गर्इ जि़न्दगी महज क्रेडिट कार्ड स्वैप कर लेने जितनी आसान नहीं होती।






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